Tuesday, 28 August 2018

दुनिया साली depressing है

टीवी पर न्यूज़ नहीं देखते अब -
रंग-बिरंगे फुदकते footage,
खोटी नीयतों के opinion
और कुत्ते-बिल्ली के चाटे गोबर के कंडे?
ये कुछ नहीं बदलते !

कल फ़ेसबुक पर एक वीडियो
सामने पड़ गया;
जो देखा
वो सीने में गड़ गया..
कठुआ का किस्सा ही ऐसा है!
क्यों देख रहे थे हम ये?
किसी को awareness फैलाना है-
के अपना पक्ष जताना है
अच्छाई को बुराई से जिताना है?

पर ऐसा होता कहाँ है..
इसीलिए साली दुनिया depressing है !

कुछ होता है कहीं
और सोशल मीडिया पर
तीन पेटिशन रिक्वेस्ट आते हैं
किसको भई ?
parliament के सफेदपोशों को -
तमाशबीन हैं साले;
क़ागज़ के पुर्जों के
popcorn बना कर गटका करते हैं
फिर आपके खून-पसीने का एक chilled सिप
...आह!
This session is adjourned.


तभी याद आता है
ये जो सुलझे से बने घूमते हैं -
रगों में हमारे भी लावा बहता है!
बोलने का मौका दीजिये
फिर  volcano भी फटता है..
हम लाख ख़याल बुन लें
जोश भरे लफ्ज़ चुन लें
पर जब तक कुछ बदलता नहीं
दुनिया साली depressing ही है !





Friday, 30 March 2018

confused नज़्म

न कुछ मिसालें देती है
न कुछ जताना ही चाहती है -
सवाल भी नहीं इसके ज़हन में कोई !

बस लफ़्ज़ हैं,  ३ + २ के सोफ़े पर
पूरी पलटन ठस कर बिठा रक्खी है
इस छोटे से पन्ने में..
जल्दी में हैं सारे, कि रस्में अदा करें
और चलते बनें भाईसाब -
रात जवाँ है अभी,
सपनों के casting director से
सामना पड़े तो
तो कुछ काम-धाम हाथ लगे !

बड़ी confused नज़्म है भई!
chronological order भी नहीं समझती;
वक़्त को ऊन के गोले सा लपेट कर
ये कैसा स्वेटर बुना है,
कि इसमें सर भी नहीं घुसता मेरा ?
sense of humor भी बैठा सा ही है !

रात के २ बजे हैं,
कुछ बयां करना था, भूल गया !
अब सच लिखूँ, तो यही है..

Thursday, 15 March 2018

भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता?

I

किसी बात पर भौंहें तनी हैं गाँव में;
बाबा ने बोला किवाड़ बँद रखने को।

"अपनी बिरादरी का है वो
दम तो दिखाना होगा इन लोगों को"
"कुछ और लोग जुटा लो-
कोई पूछेगा नहीं ज़्यादा"
"अरे डर मत.. पहचानेगा कौन?"

भीड़ में कुछ चेहरे थे वो
बाबा के खून के छींटे थे माथे पर
गुस्सैल आँखें फट कर बाहर निकलतीं
साँसों से खौफ़ छूटता था..
पर भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता!
मज़हब की दुकानों पर
नक़ाब भी बिकते होंगे शायद..

II

रोज़ाना इधर से निकलना होता है
काम ज़्यादा था, आज कुछ देर हुई
कुछ डर सा लगता है!
ये लोग ठीक नहीं लग रहे ..

"पकड़, पकड़ कर रख इसको"
"दुपट्टा खींच.. मुह पर बाँध उसके"
"अरे डर मत.. पहचानेगा कौन?"

भीड़ में कुछ चेहरे थे वो
मेरी चीख़ें सुन जिनमें पलकें भी न झपकी थीं
उन वहशियाना शक़्लों से लार टपकती थी
पर भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता!
जंगली कुत्तों को बोटी खिलाने से पहले
कालिख की परतें चढ़ाते होंगे शायद..

Tuesday, 31 October 2017

डायरी का पन्ना

उस रात न जाने नन्ही सबा को क्या सूझी,
अटारी की खिड़की धकेल, आ गयी घर में !
नींद में ऊँघती, अपनी शरारत में
उलट-पलट कर मेरी डायरी,
इक पन्ने पर जा अटकी !

डायरी का एक पन्ना मोड़ कर रखा था,
वो अक्सर तुम्हारा ज़िक्र करता है..

कभी कोई हसीं किस्सा तुम्हारा,
कुछ तुम्हारे लहराते हाथों की बतियाँ;

ज़ुल्फ़ों पर टिकती-फिसलती
महफ़िलों में नज़रें,
तुम्हारी गीली मुस्कान में घुलते
मेरे शाम-ओ-सहर..

डायरी का वो पन्ना मोड़ कर रखा था,
अब अक्सर तुम्हारा ज़िक्र करता है..

जो पिरोये थे रेशम की तहरीर में बरसों पहले
अल्फ़ाज़ वो लुढ़क कर सिमटे हुए थे कोनों में
यूँ तो मेरी ही सुखन दोहराता था, पर
डायरी का जो पन्ना मोड़ कर रखा था -
कभी लगता है तुम्हें मुझसे ज़्यादा जानता है..
आज, शायद!

Tuesday, 19 September 2017

Rise

I climb over the hillock of my mould,
Over the blazing settlements of the inherited valley
And the fire of conformity that smoulders the times
Over the ashes of presumptions floating in mid-air
Over the dense smoke clouds of darkness and ignorance


In my resilience
And my grit-
I rise
Above it all
And look down
Upon the blueprints of destiny
To pave my own way..
Here and now,
I rise..